आज 13 सितंबर 2024 को बाबा रामदेव की जयंती है. बाबा रामदेव भारत के राजस्थान के लोक देवता हैं. वे एक राजस्थानी राजा थे जिन्होंने चौदहवीं शताब्दी में पोखरण पर शासन किया था.
राजस्थान के हिंदू लोक देवता बाबा रामदेव के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाई जाती है. चौदहवीं शताब्दी के शासक रामदेव के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपना जीवन गरीबों और वंचितों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया था. यह भी माना जाता है कि उनके पास चमत्कारी शक्तियां थीं। देश में कई समूहों द्वारा इनकी पूजा की जाती है, इन्हें भगवान कृष्ण का अवतार भी माना जाता है.
बाबा रामदेवजी का धार्मिक महत्व ?
बाबा रामदेव जी ने अपनी शक्तियों के द्वारा अनेक लोगों का भला किया है. भला करने में इन्होंने यह नहीं देखा कि सामने वाला व्यक्ति हिंदू है या मुस्लिम है या फिर अन्य किसी जाति या फिर धर्म अथवा संप्रदाय का है. कई लंगड़ो को बाबा ने चलने की शक्ति दी है, वहीं कई अंधों को आंखें भी दी है.
इसके अलावा जो भी श्रद्धा भाव लेकर बाबा के दरबार में गया, बाबा ने उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी की। यही कारण है कि, जब लोगों की मनोकामनाएं पूरी होने लगी, तो उनमें बाबा के प्रति और भी विश्वास बढ़ने लगा और इस प्रकार से बाबा रामदेव जी की जयंती मनाने की शुरुआत भी हो गई.
रामदेव जयंती का उत्सव
इस दिन को अनुयायी बहुत ही श्रद्धा और समर्पण के साथ मनाते हैं। भक्त उनके मंदिरों में जाकर उनकी पूजा करते हैं और उन्हें नए कपड़े और विशेष भोजन के साथ लकड़ी के घोड़े के खिलौने चढ़ाते हैं। रामदेव के विश्राम स्थल रामदेवरा मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। एक विशाल उत्सव का आयोजन किया जाता है जिसमें सभी समुदायों के लोग भाग लेते हैं।
रामदेव की किंवदंतियाँ
बाबा रामदेव जी की चमत्कारी शक्तियों के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जब वे बच्चे थे, तब उनके पिता राजा अजमल ने एक खिलौना बनाने वाले को लकड़ी का घोड़ा बनाने का आदेश दिया। खिलौना बनाने वाले ने मोटी रकम लेकर राजा को धोखा दिया और लकड़ी के खिलौने वाले घोड़े को ढकने के लिए एक सस्ता कपड़ा इस्तेमाल किया। जब रामदेव लकड़ी के घोड़े पर बैठे, तो खिलौना घोड़ा हवा में ऊपर चला गया और कपड़ा गायब हो गया। ऐसा माना जाता है कि उनकी शक्तियों के कारण घोड़े को जीवन मिला।
एक और किंवदंती के अनुसार जब मक्का से आए कुछ संतों ने दूसरे बर्तनों में खाना खाने से मना कर दिया तो मक्का में रखे उनके बर्तन उनकी ओर उड़ते हुए देखे गए। उस घटना के बाद से रामदेव को राम शाह पीर के नाम से जाना जाने लगा।
बताया जाता है कि रुणिचा में बाबा ने जिस स्थान पर समाधि ली, उस जगह पर बीकानेर के राजा गंगासिंह ने भव्य मंदिर का निर्माण करवाया.



0 टिप्पणियाँ